कैसा राष्ट्र चाहते थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ?

राजकुमार सोनी. 
पंडित दीनदयाल उपाध्याय 20वीं सदी के ऐसे महापुरुष है जिन्होंने अध्ययन व अनुभव के बाद अपनी विचारधारा को ‘एकात्म मानववाद’ के नाम से भारतीय जनसंघ के सिद्धांत और नीति पर पर लेख में उद्घोषित किया। वे कहते थे कि आज भारत में क्रांति वालों लाने वाले दो महापुरुषों की याद आती है एक जगद्गुरु शंकराचार्य, जो सनातन धर्म का संदेश लेकर देश में व्याप्त अनाचार को समाप्त करने चले थे। दूसरे चाणक्य जिन्होंने राज्यों में बिखरी राष्ट्रीय शक्ति को संगठित कर एक मजबूत राज्य स्थापित किया था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय विचार परंपरा में शांकर वेदांत कौटिल्य के अर्थशास्त्र व स्वयं द्वारा निष्पादित ‘एकात्म मानववाद’ को नए रूप में स्थापित करते हैं। वे अक्सर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वार्षिक शिक्षा वर्गों में अपने विचार व्यक्त करते रहते थे। उनके इस सिद्धांत की पृष्ठभूमि में दो आयाम हैं। पहला, पश्चिमी जीवन दर्शन और दूसरा भारतीय संस्कृति। अपने लेखों और भाषणों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय संस्कृति का गौरवपूर्ण वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि हम प्राचीन संस्कृति को मात्र संग्रहालय बनकर इनका पोषण नहीं कर सकते। हमें संस्कृति को गति देकर इन्हें सजीव और सक्षम बनाना है। हमें रूढ़ियां समाप्त करनी होगी। दीनदयाल उपाध्याय पश्चिमी संस्कृति के प्रति सावधान और भारतीय मूल्यों के उपासक थे। उनका सूत्र था कि हम मानव के ज्ञान और उपलब्धियों को संकलित कर विचार करें। इन तत्वों में जो हमारा है उसे युगानुकूल और जो बाहर का है उसे देशानुकूल ढाल कर आगे चलने का विचार करें। उनके एक भाषण का यहां का उल्लेख कर रहा हूं.। बकौल दीनदयाल उपाध्याय, ‘विश्व का ज्ञान और आज तक की अपनी संपूर्ण परंपरा के आधार पर हम एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जो हमारे पूर्वजों के भारत से अधिक गौरवशाली होगा। जिसमें जन्मा मानव अपने व्यक्तित्व का विकास करता हुआ संपूर्ण मानवता ही नही अपितु सृष्टि के साथ एकात्मता का साक्षात कर नर से नारायण करने में समर्थ हो सके। हमारी संस्था का केंद्र मानव होना चाहिए। भौतिक उपकरण मानव के सुख के साधन है ‘साध्य’ नहीं। हमारा आधार एकात्म मानव है। एकात्म मानववाद के आधार पर हमें जीवन की सभी व्यवस्थाओं का विकास करना होगा।’ पंडित दीनदयाल उपाध्याय उस समय के एक विरोधी दल के प्रमुख नेता थे। उनका तो यह कर्तव्य ही था कि जो त्रुटियां दिखाई दें, उन पर अपना मत असंदिग्ध शब्दों में प्रकट करें और उन्होंने वह किया भी। उनके सब लेखों और भाषणों से पता चलता है कि उनके हृदय में कटुता नहीं थी। मैंने जितना भी उनके बारे में पढ़ा है, उससे यह ध्यान में आता है कि वह कभी किसी से जरा भी नाराज नहीं हुए। बहुत गलती या खराबी होने पर कभी खराबी या गलती करने वाले के प्रति अपशब्द का प्रयोग नहीं किया। मैं उन्हें युधिष्ठिर के समान मानता हूं। बरसों तक जनसंघ के महामंत्री और अंत में अध्यक्ष रहने के बावजूद भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय दलगत राजनीति और सत्ता राजनीति से ऊपर रहे। वे वास्तव में देश में ऐसी व्यवस्था विकसित करना चाहते थे जो भारत की प्रकृति और परंपरा के अनुकूल और राष्ट्र के सर्वांगीण उन्नति करने में समर्थ हो। केवल एकात्म मानववाद ही ऐसा ही ऐसा मार्ग है जिस पर चलकर भारत ही नहीं विश्व की गरीब, पीड़ित, पिछड़ी जनता को उसकी वर्तमान स्थिति से ऊंचा उठाकर सम्मान पूरक जीवन जीने के लिए सहारा दिया जा सकता है। आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं। 
-लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं

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